अरे भय्या ये पर्ची कहाँ जमा करानी है…….!

अरे भय्या वो पर्ची कहाँ से मिलेगी…………!

कुछ ऐसा ही अक्सर सुनने को मिलता है लोगो के मुँह से जब भी कभी हम किसी सरकारी अस्पताल में जाते हैं। अधिकाँश लोग तो बड़े बड़े अस्पताल की बिल्डिंग में बने दूर दूर कमरो के चक्कर ही काटते हुए नज़र आते हैं, बस हाथो में लबालब कागज़ भरे कभी किसी तो कभी किसी टेबल पर खड़े हो जाते हैं, क्योंकि ज़्यादातर लोग जो सरकारी अस्पतालों में आते हैं वो अनपढ़ या मज़दूरी करने वाले लोग होते है और उन्हें जागरूकता के अभाव से परेशानी का सामना करना पड़ता है| असल में बड़े बड़े उपकरण और भव्य बिल्डिंग होने के साथ साथ कुछ और बड़े सुधार करने की ज़रूरत महसूस होती है, ताकि कमरे दर कमरे भटकते लोगो को ये पता चल पाए की कब उन्हें किस डॉक्टर के कमरे में जाकर मिलना है कुछ तय हो| या किसी डॉक्टर ने अगर मरीज़ को दूसरे कमरे के डॉक्टर को रेफर किया है तो वो डॉक्टर अपनी जगह पर है या नहीं, नहीं है तो कब तक आएगा| बस यही सब सवाल लिए मरीज़ के परिजन इधर से उधर कमरो में चक्कर लगाते रहते हैं| और इसपर कोई गार्ड धमका दे या कोई डॉक्टर किसी से भी “जाओ कंप्लेंट कर दो” कहकर डरा दे तो अलग बात है, खैर क्या कहें, सभी के अपने एक्सक्यूजेज़ हैं गार्ड को भीड़ हटानी है तो डॉक्टर के पास काम ज़्यादा है| पर आजकल तो अस्पतालों में भी गार्ड के बजाये बाउंसर दिखते हैं जैसे वहां डकैत आते हों, और वो मरीज़ के परिजनों को ऐसे समझकर धमकाते हैं जैसे वे और कोई नहीं लादेन के रिश्तेदार आये हों।

पर ऐसे में क्या इस डिजिटल भरे युग में कोई ऐसा समाधान नहीं निकल सकता| जैसे की मान लीजिये, मरीज़ आया तो उसको एक रजिस्ट्रेशन नंबर मिल गया, जिसका मेसेज परिजन के मोबाइल पर आ जाए साथ ही एक पर्ची नुमा भी मिल जाए जिससे थोड़े अनपढ़ लोग भी समझ पाएं, और हर डॉक्टर उस पर्ची पर अगले डॉक्टर का कमरा नंबर लिख दे और साथ ही मोबाइल पर मेसेज भी आ जाए| ताकि मरीज़ और परिजनों को पता लगता रहे की कब कहाँ किससे मिलना है, या उस रजिस्ट्रेशन नंबर से कोई अनपढ़ भी किसी काउंटर पर जाकर पूछे मुझे कहाँ किससे मिलने को बोला गया है तो कोई काउंटर वाला अपने सिस्टम में वो नंबर डालकर बता दे की आप इस कमरे में मिल चुके हो और आपको उस फलां कमरे में जाने को बोला गया है। और इस तरह का ऑनलाइन डाटा अस्पताल के पास रहने से वह भविष्य में भी पूछे जाने पर बता पायेगा की किस मरीज़ का क्या इलाज चला है।

 

खैर ये तो एक सुझाव की बात है पर इससे अलग, जो हालात अब हैं वो कितने सही हैं| एक तरफ बैलगाड़ी तो दूसरी तरफ राकेट, इसमें बैठ नहीं सकते तो उसमे चढ़ नहीं सकते| मतलब सरकारी और प्राइवेट अस्पताल, बहुत से प्राइवेट अस्पताल तो किसी विलेन से भी ज़्यादा खतरनाक नज़र आते हैं, एक ही इलाज एक क्लीनिक पर 5000 में हो रहा है तो बड़े अस्पताल में 50000 में भी नहीं हो पा रहा है अब समझ नहीं आता कौन गलत कौन सही है बस ऊपर वाला ही बचाये और सही सलामत घर भेज दे| एक ही अस्पताल में एक कमरे के 5000 तो दुसरे कमरे के 10000 रूपए प्रतिदिन किराया, ऐसे में मिडल क्लास वाले सोचते हैं “कमरा क्या हमें घर लेके जाना है, तू बस इलाज कर दे चाहे सीढ़ियों के नीचे लिटा दे”| बहरहाल आखिर पंगा कौन ले, डॉक्टर के हाथ में जान पड़ी है वो जो कह दे वही ब्रह्मज्ञान नज़र आता है|

भई मुझ अनपढ़ को ये समझ नहीं आता के एक ही इलाज दो अलग अलग कीमत पर कैसे हो सकता है, अगर किसी कमरे में ऐ.सी लगा है चमकती टाइल लगी हैं तो बेचारे मरीज को उससे क्या लेना देना, कोई होटल हो तब तो बात समझ में आती है की मज़े के लिए कोई चाहे कितना ही महँगा खर्च करे, पर बीमारी पर तो ये सब झेलना एक मजबूरी ही है| ऊपर से विश्वसनीयता तो इस मार्केटिंग के युग में एक अक्कड़ बक्कड़ का पासा ही नज़र आती है, किसी के हाथ 1 तो किसी के हाथ 6 लग जाये सब ऊपर वाले, मतलब ऊपर के डॉक्टर को ही पता होता है|

क्या देश में इन मूलभूत ज़रूरतों पर कोई नियम की ज़रूरत नहीं है जहां एक तरफ सरकारी अस्पताल पर लापरवाही का आरोप लगता है तो क्या एक डिजिटल ऑनलाइन सिस्टम नहीं होना चाहिए जिससे अस्पताल की भी कार्यप्रणाली और ज़िम्मेदारी उल्लिखित हों| और अगर प्राइवेट अस्पताल भी हैं तो वे समाज के हर तबके के लिए हों| जीवन की मूलभूत सुविधाओ से जुड़ा हुआ कोई भी संस्थान उस देश के हर एक नागरिक के लिए सुविधाजनक होना चाहिए| किसी को कमाई करनी है तो थिएटर खोले, मॉल खोले, बड़ी बिल्डिंगें बनाये पर कम से कम स्कूल और अस्पताल को बख्श दे| किसी भी स्कूल और अस्पताल से जुड़ा हर नियम हर फीस का तय होना सरकार को अपने हाथ में रखना चाहिए, किसी के पास अगर बहुत पैसा है तो वो उसी अस्पताल में इलाज कराकर फ़ालतू पैसा चंदे के रूप में दे दे पर फीस तो हर वर्ग के लिए सोच सकने लायक होनी चाहिए| क्योंकि स्कूल और अस्पताल इन्ही दो स्तंभो पर देश का भविष्य खड़ा है इन्ही दो सुविधाओ को सरकार को हर झोली में परोसना पड़ेगा तभी हर नन्हा बचपन और सभी नौजवान देश के विकास के बारे में सोच पाएंगे नहीं तो वे अपने ही विकास में लड़खड़ा जाएंगे|

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