आज समाज जहां विकास और सभ्यता के नए नए चरण चढ़ता जा रहा है, वही कुछ छोटी छोटी बुनियादी बातें समाज को दोबारा पढ़ाया जा रही हैं| जैसे की बेटी को पढ़ाना और उसका पालन करने का अभियान जन जन में पहुचाना पड़ रहा है, और जन जन से बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ कहना पड़ रहा है पर भौतिक रूप से बेटी को पढ़ाना भर कह देने से क्या उसकी भ्रूण हत्या रोक देगा, क्या जन जन के सामाजिक वातावरण में कुछ और ज़रूरी बदलाव करने की ज़रूरत अब नहीं पड़ेगी| सबसे पहला दानव जिसका नाम दहेज़ है जो की एक पैदा हो रही बच्ची के जीवन अस्तित्व, मान सम्मान और अगर आगे सोच लिया जाए तो उसके भविष्य और विकास पर अपना पंजा उसके जीवन में आने से पहले ही जमाये रखता है उस दानव को ख़तम करने के लिए सोचने की अब ज़रूरत नहीं पड़ेगी, यहाँ मुख्यता मैं बात गरीब और निम्न मध्यम वर्गीय लोगो की ही कर रहा हूँ, क्योंकि दहेज़ में नए से नए मॉडल की गाडी निकलवाना अभी भी बहुत से उच्च और उच्च मध्यम वर्गीय लोगो के लिए पैशन और स्टेटस की नुमाइश का एक वाजिब सा मौका है, नहीं तो आज भी अलमारी, बक्सा, चूल्हा, चकला, ड्रेसिंग और मोटर साइकिल के लिए इकठ्ठा करते करते इसी दुनिया के कुछ लोगो की उमर बीती जा रही है|

मैं खुद से पूछता हूँ आखिर ये बे मतलब सा चलन है क्या, पश्चिम के लोग तभी शायद होशियार कहलाते हैं की वो शादी करते हैं तो एक जगह इकट्ठी सेरेमनी कर, मेहमान लोगो को खाना पीना खिला, खुद ही नाच गा अपने अपने घर निकलते हैं, और हम लोग विकास के नए नए ईजाद करने के बजाये चूल्हा चकला इकठ्ठा करने में उमर बिता रहे हैं| पर मैं बेटी के बाप को दोष नहीं दे रहा हु, वो बेचारा आखिर करे तो क्या करे, बेटी पैदा होते ही दिमाग में 10-15 लाख की फिगर दाएं बाएं नाचने लगती है, फिर चाहे ओवरटाइम करना पड़े या बॉस की डांट या शोषण ही सहना पड़े नौकरी पर जमे रहने के लिए, कैसे बेटी को ऐसे ही निकाल दे तो समाज क्या कहेगा, समाज तो चलो कमरे के बाहर की चीज़ है वो जेठानि देवरानी जिनके पति दहेज़ की मोटर साइकिल पर कपडा मार मार चमकाएंगे, उनके सामने कैसे आया जाए| या फिर थक हार बेटी को ही ससुराल में ऐसे रहना पड़ेगा जैसे की कोई प्रमोटेड पास स्टूडेंट फर्स्ट ग्रेड स्टूडेंट्स की क्लास में बस चुप चाप पास होने की इंतज़ार में अपना टाइम पास करता है|

पर ऐसा नहीं है की समाज में बस बुराइयां ही हैं, बहुत से ससुराल वाले भी हैं जिन्होंने बहु को बेटी की तरह अपनाया बिना किसी दहेज़ की परवाह किये| पर मैं मानता हूँ ये प्रथा किसी क़ानून या दबाव से नहीं जायेगी , जैसे की सरकार या क़ानून किसी से ये नहीं कहते के जीन्स की पेंट अब पुरानी हो गयी है अब डेनिम की पहना करो या लॉन्ग कट बाल अब बेहूदा लगते हैं, अब स्पाई कट रखा करो, पर फिर भी सब के सब लोग एक से परिवेश में खुद ब खुद ढल जाते हैं| तो इस तरीके से जैसे मॉडल नए फैशन को जन मानस तक पहुचाते हैं, सबसे पहले संपन्न परिवारो की ज़िम्मेदारी है की दहेज़ को लेने और देने से मना करें| फिर धीरे धीरे निम्न और माध्यम वर्गीय लोग बिना किसी सामाजिक दबाव के इसको अपनाते चले जाएंगे|

1 COMMENT

  1. Dahaj ek bimari hai aur iska ilaj krna bahut jarur hai, sabhi naujawano ko isse samjhna hoga aur apne mata-pita ke sath-2 apne dosto ko bhi dahej na lene ka batana hoga.

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