सोशल कॉज – नहीं चाहिए विकास, पहले रोटी चाहिए

यहां मैं न किसी आंकड़े पर विमर्श और न ही किसी तंत्र का विरोध कर रहा हूँ| बस यूँ ही ज़हन में बात आयी तो खुद से सवाल जवाब करने लगा की एक तरफ अनाज भंडारो में अनाज रखा हुआ सड़ता न्यूज़ चेनलों पर दिखाई दे रहा है, बेमियादी बारिश या किसी और वजह से और फिर दिखाई दे रहा है की किसान मर रहे हैं| और मेरे कैलकुलेशन के असमंजस की हद तो तब हो गयी जब मेने सुना के इस अन्न प्रधान देश में कोई भूख से भी मर गया छत्तीसगढ़ में कहीं| तब मेरी अंकगणित ने मेरे काबिल होने पर सवाल उठा दिया ये कह कर की अगर अनाज भरपूर उगा तो किसान क्यों मरा, क्या उसने किसी मौसम भी अच्छी फसल नहीं उगाई, अगर उगाई तो पैसा नहीं कमाया या अपने जीवनयापन के लिए कुछ बचा कर नहीं रखा या फिर वो मेरी तरह ही नादान निकला, के लिया न दिया और नौकरी छोड़कर बैठ गया|

नहीं चाहिए विकास, पहले रोटी चाहिए| सोशल कॉज

तो फिर यहां किसान, अनाज और भूखे पेट के बीच में अवरोध है कौन, जो न तो फ़ालतू अनाज, जो फिक रहा है वो किसी भूखे पेट तक पहुचने दे रहा है, और न ही पैदा हुए अनाज से किसान को धनवान बनने या आत्महत्या से बचने ही दे रहा है|

क्या सरकारों को ये दूरी ख़तम नहीं कर देनी चाहिए, की किसान के उपजे अनाज की संतोषजनक राशि सीधे उसे मिल जाए और दूसरी तरफ भूखे को उसके पेट भर का अनाज सीधे उसे ही मिल जाए और कमस कम वो भूखे मरने से बच जाए| सड़क, बिल्डिंग, विकास और जी.डी.पी का इंतज़ार तो अब तक हुआ तो चलो कल तक भी कर लेंगे, पर शायद कोई भूखे पेट रहकर या क़र्ज़ में डूबकर न कर पाए|

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