अभी मेरे बाजू से एक बाइक बड़ी तेज़ी से गयी और मेरे हाथ से मेरा मोबाइल फिसल के नीचे गिर गया, मेने मोबाइल उठाया और चेक किया, पर चलो मोबाइल का कवर लगे होने से ज़्यादा नुक्सान नहीं हुआ| पर कुछ परिवारो को बाइक पर जाते हुए देखा है जिसमे छोटे छोटे बच्चे बाइक पर बैठे होते हैं, और कोई एक छोटा बच्चा गोद में भी होता है, तो मुझे ये बड़ा रिस्की नज़र आया| मुझे लगता है लोगो को टू व्हीलर पर परिवार और बच्चो को ले जाते हुए बहुत अच्छी तरह और कस के बच्चो को लेकर बैठना चाहिए, किसी मोबाइल की तरह एक हाथ से नहीं| सड़क पर चलते हुए या गाडी चलाते हुए हमें थोड़ा बहुत डर के ही रहना चाहिए, अपनी ड्राइविंग योग्यता के मद्दे नज़र नहीं बल्कि दुसरे की ड्राइविंग योग्यता के ऊपर शक करते हुए|

आजकल बन रहे ड्राइवर्स की कुशलताओं के बारे में क्या बखान करूं या चट मंगनी और पट्ट ब्याह की तर्ज़ पर धड़ाधड़ बन रहे ड्राइविंग लाइसेंस के ऊपर क्या अपना ऑब्जरवेशन निकालूँ|

आप सड़क पर निकलो और देखो कैसे मोटरसाइकिल की रेस लग रही होती है, बस रेड लाइट को ज़रा फाइव, फॉर, थ्री और टू लिखने दो, और वन आने से पहले बाइकें और कारें रेस लगानी शुरू हो जाती हैं, और रेड लाइट पार कर रहे लोग तो स्पार्टन की तरह फटाफट गाड़ियों के बीच आजु बाजू होने लगते हैं, दूर खड़े ये सब देख तो मेरी हँसी भी छूट जाती है, क्योंकि लोग तो सोचते होंगे जीरो आने से पहले आखिरकार रोड पार कर ही लेंगे पर उन्हें क्या पता ये गाड़ियों की रेस जीरो होने से पहले ही छूट जायेगी| वैसे मुझे भी नहीं पता के लोग रेड लाइट के 60 से 58 सेकंड तक इंतज़ार ही क्यों करते हैं जब उन्हें ग्रीन होने से पहले ही भागना होता है| और ज़ेबरा भाईसाब तो कितने पीछे रहते हैं किसी को दीखता ही नहीं मतलब ज़ेबरा क्रासिंग भाईसाब, मतलब जो बेचारा ज़ेबरा क्रासिंग के पीछे खड़ा होता है वो तो हिंदी फिल्म के किसी हीरो का एक बेवकूफ सा दोस्त नज़र आता है|

यहाँ मैं सड़क पर होने वाली किसी अनहोनी को नज़र अंदाज़ बिलकुल नहीं कर रहा हु, बल्कि उसी गंभीरता पर हास्य रस में बात कर अपनी घबराहट को छिपाने की कोशिश कर रहा हूँ| लगता है के लोगो को लेन, ओवरटेक, अचानक ब्रेकिंग वगैरा की जानकारी बड़ी सीमित नज़र आती है या वो इसका पालन करने से बचते हैं, मेरा मानना है की हाइवेज छोड़कर, क्योंकि हाइवेज़ पर दू-पहिये पहले ही साइड में चलते हैं पर मेट्रो सिटीज़ में दुपहियों की लेन दुसरे नंबर पर आ जाती है, और दो दानवो के बीच में एक बेचारी दू-पहिया गाडी को डगमगाते डगमगाते सफर करना पड़ता है, बस कोई बराबर में तेज़ से न निकल जाए| मेट्रो सिटीज़ की ड्राइविंग में खतरा अगर किसीको रहता है तो वो टू व्हीलर को ही रहता है, क्योंकि बैलेंस पर चलने वाली एकमात्र टू व्हीलर (बाइक, स्कूटर) ही चौपायों, छः -पायो के बीच में रहती है, बाई साइकल तो इन मोटर गाड़ियों की जमात से पहले ही डर के दूर रहती है| मेट्रो सिटीज़ में स्पीड के लिहाज़ से चार, छः पहिये वाली गाड़ियां तो किसी अनहोनी होने पर एक हद्द तक सुरक्षित कही जा सकती हैं, ले दे कर बाइक, स्कूटी वगेरा ही बेचारी बड़े रिस्क में रहती हैं जो सड़क पर इन चार, छः पहिये के वाहनों की दया पर रहती हैं, और अगर इनको कोई बिगड़ैल चला रहा हो तो इन दू-पहियो की सुरक्षा को तो ऊपर वाला ही अता फरमाये|

प्रशासन को मेट्रो सिटीज़ में इन दू-पहियो की हिफाज़त के ऊपर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए| या तो एक अलग लेन बनाये या हर तरह के वाहन को अपनी अपनी लेन में चलने पर स्ट्रिकट करे| और सुझाव के तहत एक 25 मिनट का ऑनलाइन ड्राइविंग टेस्ट कम्पलसरी कर दे जिसमे किये गए किसी भी ट्रैफिक उलंघन पर ऑनलाइन मार्क्स कटें, जिसमे प्राप्त किये मार्क्स के आधार पर लाइसेंस बने और कम मार्क्स आने वालो के लिए हफ्ते भर बाद दोबारा टेस्ट लिया जाए, मतलब लाइसेंस दिया ज़रूर जाए, क्योंकि अगर लाइसेंस नहीं दिया जाएगा तो मारमारी बढ़ेगी और दलालो की चांदी हो जायेगी| अर्थार्त मार्क्स के हिसाब से लाइसेंस में ग्रेड होना चाहिए और कम ग्रेड वालो को एक निश्चित अवधि में अपने ग्रेड को सही करना आवश्यक होना चाहिए|

और इससे इतर अगर ये सब नहीं भी है तो चलो, अपनी सुरक्षा अपने हाथ, और खुद ही बचकर और संभल कर चल लेते हैं

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