आज मैं बड़ी दूर कही एक छोटी सी पहाड़ी पर आँखे मूँद सूरज की तेज़ धूंप में लेटा हुआ हूँ, तापमान की हलकी ठंडक और सूरज की तेज़ धूंप का बराबर बैलेंस मेरे शरीर की सारी थकावट निकाल रहा है, इस भागती हुई ज़िन्दगी में खुद को समझने का एक बेहतरीन, पर खोया हुआ तरीका मुझे यकायक सूझ गया, पर लेटे लेटे दिमाग में एक पुराना सवाल फिर बड़ी ख़ामोशी से कुलबुलाने लगा की सक्सेस आखिर है क्या?

— बड़ी मुश्किल से दसवी में सेकण्ड डिवीज़न लाना, या बड़ी आसानी से फ़स्ट डिवीज़न पास हो जाना, पर रेंक थर्ड रह जाना!
— 20 हज़ार की नौकरी में घर खर्च निकाल कुछ शौक पूरे कर लेना या एक लाख की नौकरी करते हुए भी किसी चीज़ की खरीद या कोई शौक पूरा करने से वंचित रह जाना|
— किसी रेहड़ी की 5 रूपए की चाय पीते हुए दोस्तों में बतियाना या कुछ ऊंचे स्टेटस कुलीग्स के साथ 300 रूपए की चाय भी फीकी लगने पर अधूरी छोड़ आना|

वगैरा वगैरा,,,,,,,,,,,,,!
कई बार किसी भी हद्द तक जाकर कुछ पा लेना भी कभी कभी किसी के हाथो में पड़ी हुई सक्सेस के सामने बौनी दिखाई पड़ती है| तो क्या, जीवन की सच्चाई और सरलता को जाने बिना, हाथ में पड़ी चीज़ को छोड़ हर चमकदार चीज़ को छूने के लिए मन को झोंके रहना ही सफलता है क्या?

अगर देखा जाए तो ज़्यादातर सो-कॉल्ड सफल लोग जिनकी मेहनत और लगन की चर्चा होती है, जबकि उनकी सफलता के रास्ते में हुई निरंतर मेहनत के पीछे जीवन की प्रवाह, जो साथ में लगी रही और उन्हें आक्सीजन देती रही उसे भी समझना आज के नौजवान के लिए उतना ही ज़रूरी है जैसे किसी आविष्कार को करने पीछे उसका मेकेनिज़्म समझना| सफलता के लिए की गयी हर मेहनत दूर से जितनी गाढ़ी और काली दिखाई देती है पास जाकर देखने पर उसमे जीवन की ऑक्सीजन के बुलबुले नज़र आ ही जाएंगे|

किसी बाप का रिटायरमेंट के बाद बेटियों की शादी निबटा कर परिवार के साथ किसी तीर्थ स्थान पर जाने को आप कैसी सफलता में गिनोगे, या शाम को घर लौटते किसी मज़दूर का अपने बच्चे को पहली बार आ से अनार लिखते हुए देखना, ये भी एक अच्छी और शायद एक महान सफलता में गिना जा सकता है|
कैसे एक सक्सेस दूसरी सक्सेस से ज़्यादा महान हो सकती है| कैसे बड़े एक्टर विज्ञापनों में महान और कामयाब ज़िन्दगी का बड़ा सीधा सा और सिमटा हुआ सा उदाहरण देते हुए नज़र आते हैं, और सफलता की परिभाषा को सिर्फ एक ही तरफ मोड़ देते हैं|

कोई भी सफलता बिना जीवन के उपभोग किये या तो उस परचम तक पहुँच नहीं सकती या फिर वो किसी दुसरे के लिए एक उचित आदर्श का स्रोत नहीं बन सकती| और ये किसी “अंगूर खट्टे हैं” तरह का उदाहरण पेश करने की कवायद नहीं है, सिर्फ जीवन और संघर्ष दोनों की मिली जुली मात्रा का तालमेल बैठाने की एक चिंता है|

तो…………, कहने का मतलब था की………………..!

“Lets Enjoy Life”

उफ्फ्फ,,,,,,, सोचते सोचते ये सूरज भी अब सर पर चढ़ आया है और धुप में चुभन भी बढ़ गयी है, चलो अब मैं अंकल के घर जिनके यहाँ में छुट्टी में रहने आया हूँ निकलता हूँ, और शाम को आइस क्रीम खाने भी जाना है साथ ही उनके काम में हाथ भी बटाना है|

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY